भारत की घरेलू दौलत का सच, 65% संपत्ति सिर्फ़ 10% लोगों के पास, जानिए एक्सपर्ट की राय
UP TIMES18 : भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में गिनी जाती है। ग्रोथ स्टोरी और चमकदार विकास दर की बातें भले ही सुर्खियों में हों, लेकिन ताज़ा रिपोर्ट ने एक चौंकाने वाला सच उजागर किया है। देश की कुल घरेलू संपत्ति का 65% हिस्सा सिर्फ़ शीर्ष 10% अमीर लोगों के पास है। यानी आम जनता मेहनत करती है, लेकिन दौलत का बड़ा हिस्सा अब भी चुनिंदा हाथों में सिमटा हुआ है।
घरेलू कर्ज़ पर भारी बोझ
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में घरेलू देनदारियाँ तेज़ी से बढ़ रही हैं। पिछले सालों में कर्ज़ 12.1% की दर से बढ़ा और अब यह जीडीपी के 41% तक पहुँच चुका है। इसका सीधा मतलब है कि आम घरों पर कर्ज़ का बोझ पहले से कहीं ज़्यादा हो गया है।
इस विषय पर एल.टी.पी. कैलकुलेटर के आविष्कारक व डैडीज इंटरनेशनल स्कूल के संस्थापक डॉ. विनय प्रकाश तिवारी ने कहा “भारत में आम लोग मेहनत करके दौलत बनाते हैं, जबकि अमेरिका जैसे विकसित देशों में पैसा खुद पैसा बनाने का काम करता है। वहाँ निवेश और पूँजी से कमाई होती है, यहाँ मेहनत से। अगर हमें आने वाली पीढ़ियों को मज़बूत बनाना है तो घरेलू बचत को इक्विटी और प्रोडक्टिव एसेट्स में लगाने की आदत डालनी होगी।”
वैश्विक संपत्ति की तस्वीर
पिछले एक दशक में अमेरिका ने दुनिया की 47% संपत्ति अपने पास इकट्ठी कर ली। चीन ने 20% और पश्चिमी यूरोप ने 12% हिस्सा लिया। इससे साफ़ है कि तमाम आर्थिक चुनौतियों के बावजूद अमेरिका की पकड़ आज भी सबसे मज़बूत है।
भारत बनाम विकसित देश
भारत की घरेलू संपत्ति में शेयर बाज़ार की हिस्सेदारी सिर्फ़ 13% है। तुलना करें तो अमेरिका में यह आँकड़ा 59% और यूरोप में 35% तक पहुँच चुका है। यही वजह है कि भारत का मध्यमवर्ग और निम्नवर्ग नौकरी और मेहनत पर अधिक निर्भर है, जबकि विकसित देशों में निवेश ही संपत्ति बढ़ाने का प्रमुख साधन है।
असमानता की गहराती खाई
2024 तक भारत की कुल संपत्ति का बड़ा हिस्सा सिर्फ़ अमीर तबके तक सीमित हो गया। रिपोर्ट बताती है कि आर्थिक असमानता तेज़ी से बढ़ रही है और गरीब तथा मध्यवर्ग के लिए सामाजिक-आर्थिक रूप से ऊपर उठना और कठिन होता जा रहा है।
आगे की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर लोगों को सशक्त बनाना है तो केवल बचत ही नहीं, बल्कि सही निवेश की आदत भी विकसित करनी होगी। प्रोडक्टिव एसेट्स, म्यूचुअल फंड्स और इक्विटी मार्केट में भागीदारी बढ़ाकर ही भारत अपने मध्यमवर्ग को मज़बूत बना सकता है और अमीरी-गरीबी की खाई को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।
Disclaimer : म्यूचुअल फंड और शेयर बाज़ार निवेश बाजार जोखिमों के अधीन हैं। यहाँ दिए गए आँकड़े और उदाहरण रिपोर्ट पर आधारित हैं। भविष्य की स्थिति अनिश्चित हो सकती है। निवेश का निर्णय लेने से पहले SEBI-रजिस्टर्ड वित्तीय सलाहकार से परामर्श लें।


















