देर से पहुँचा छात्र, बंद दरवाज़ा और टूटता भविष्य, क्या परीक्षा में एंट्री रोकना न्यायसंगत है?

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देर से पहुँचा छात्र, बंद दरवाज़ा और टूटता भविष्य, क्या परीक्षा में एंट्री रोकना न्यायसंगत है?

चंदौली : समय पर पहुँचना अनुशासन का आधार है, लेकिन क्या कुछ मिनटों की देरी किसी छात्र के पूरे साल की मेहनत पर भारी पड़ जानी चाहिए? यही सवाल आज शिक्षा व्यवस्था के सामने खड़ा है। डैडीज़ इंटरनेशनल स्कूल, बिशुनपुरा कांटा के संस्थापक डॉ. विनय प्रकाश तिवारी ने इस संवेदनशील मुद्दे पर मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया है।

परीक्षा केवल प्रश्नपत्र नहीं, पूरे साल की मेहनत
तीन घंटे में लिखी जाती है एक वर्ष की कहानी

डॉ. तिवारी का कहना है कि परीक्षा केवल तीन घंटे का प्रश्नपत्र नहीं, बल्कि 365 दिनों की कड़ी मेहनत, त्याग और सपनों का परिणाम होती है। एक छात्र जब परीक्षा केंद्र तक पहुँचता है, तो उसके साथ माता-पिता की उम्मीदें, शिक्षकों का विश्वास और उसका पूरा भविष्य खड़ा होता है। ऐसे में केवल देरी के आधार पर उसे परीक्षा से वंचित कर देना कहीं न कहीं अन्याय जैसा प्रतीत होता है।

हर देरी लापरवाही नहीं होती, परिस्थितियाँ भी कई बार जिम्मेदार

उन्होंने कहा कि हर देरी लापरवाही का परिणाम नहीं होती। ट्रैफिक जाम, बस या ट्रेन की खराबी, अचानक तबीयत बिगड़ना या पारिवारिक आपात स्थिति जैसी परिस्थितियाँ छात्र के नियंत्रण से बाहर हो सकती हैं। कोई भी छात्र, जिसने पूरे साल पढ़ाई की हो, जानबूझकर अपना भविष्य दांव पर नहीं लगाना चाहता।

अंदर खाली सीटें, बाहर खड़ा छात्र, नियमों की कठोरता पर उठते सवाल

डॉ. तिवारी ने सवाल उठाया कि जब परीक्षा कक्ष के भीतर कुर्सियाँ खाली हों, प्रश्नपत्र उपलब्ध हों और परीक्षा का समय चल रहा हो, तब गेट के बाहर खड़े छात्र को अंदर न आने देना किस उद्देश्य की पूर्ति करता है। देर से आया छात्र पहले ही नुकसान में होता है उसे कम समय मिलता है, दबाव अधिक होता है और बेहतर प्रदर्शन की संभावना घट जाती है। यह उसका प्राकृतिक दंड है। लेकिन उसे पूरी तरह परीक्षा से रोक देना व्यवस्था द्वारा दिया गया अतिरिक्त दंड बन जाता है।

नियम व्यवस्था के लिए, भविष्य छीनने के लिए नहीं

उन्होंने स्पष्ट किया कि नियम व्यवस्था के लिए होते हैं, भविष्य छीनने के लिए नहीं। देर से आए छात्र की एंट्री दर्ज की जा सकती है, रिपोर्ट बनाई जा सकती है, समय में कोई अतिरिक्त छूट न दी जाए- लेकिन उसे लिखने का अवसर तो मिलना चाहिए।

कठोर निर्णय तोड़ देता है आत्मविश्वास

डॉ. तिवारी ने चिंता जताई कि इस तरह की कठोरता कई बार छात्रों के आत्मविश्वास को तोड़ देती है और वे मानसिक तनाव या अवसाद की स्थिति में चले जाते हैं। शिक्षा का उद्देश्य सज़ा देना नहीं, बल्कि अवसर देना और सुधार का मार्ग दिखाना होना चाहिए।

गेट पर खड़ा छात्र अकेला नहीं होता, उसके साथ खड़ा होता है उसका पूरा भविष्य

उन्होंने भावुक अपील करते हुए कहा, “कभी-कभी पाँच मिनट भी पूरे साल की मेहनत का सम्मान होते हैं। अगर छात्र किसी तरह परीक्षा केंद्र तक पहुँच गया है, तो उसकी कलम मत रोकिए। समय कम दीजिए, लेकिन उम्मीद का दरवाज़ा बंद मत कीजिए।”

यह विचार न केवल शिक्षा व्यवस्था में मानवीय संतुलन की माँग करता है, बल्कि यह भी याद दिलाता है कि अनुशासन के साथ करुणा हो, तभी न्याय पूर्ण होता है।