दौड़ती अर्थव्यवस्था को मिला धीमा ईंधन? बजट 2026-27 की सच्चाई, जानिए एक्सपर्ट की राय
यूपी TIMES18 : एक्सपर्ट एलटीपी कैलकुलेटर के आविष्कारक एवं SEBI पंजीकृत निवेश सलाहकार डॉ. विनय प्रकाश तिवारी का कहना है कि बजट 2026-27 केवल आय-व्यय का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि सरकार की आर्थिक सोच और देश की विकास दिशा का आईना है और इस आईने में तेज़ रफ्तार से ज्यादा सतर्कता झलकती है।
बजट 2026-27 को समग्र रूप से देखें तो यह संतुलन साधने का प्रयास जरूर है, लेकिन सवाल उठता है कि क्या मौजूदा वैश्विक और घरेलू परिस्थितियों में भारत को केवल संतुलन की जरूरत थी या फिर साहसिक आर्थिक फैसलों की। अर्थव्यवस्था उस मोड़ पर खड़ी है जहाँ निवेश, रोजगार और मांग को एक निर्णायक धक्का देने की आवश्यकता थी, लेकिन बजट में आक्रामकता की जगह सावधानी अधिक दिखाई देती है।
पूंजीगत व्यय यानी कैपेक्स में लगभग 11 प्रतिशत की वृद्धि घोषित की गई है। कागज़ पर यह आंकड़ा संतोषजनक लग सकता है, लेकिन जब महंगाई 6–7 प्रतिशत के स्तर पर हो और स्टील, सीमेंट, मशीनरी जैसी निर्माण लागत लगातार बढ़ रही हो, तब यह वृद्धि वास्तविक अर्थों में सीमित प्रतीत होती है। इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च का गुणक प्रभाव पूरी अर्थव्यवस्था को गति देता है। सड़क से लेकर उद्योग और रोजगार तक। ऐसे समय में अपेक्षा थी कि सरकार बड़ा और निर्णायक कदम उठाएगी।
रक्षा बजट का कुल आकार लगभग 7.85 लाख करोड़ रुपये है, लेकिन इसमें पेंशन का बड़ा हिस्सा शामिल है। पेंशन घटाने के बाद वास्तविक आधुनिकीकरण और ऑपरेशनल खर्च करीब 6 लाख करोड़ रुपये के आसपास बैठता है। भारत जब वैश्विक मंच पर रक्षा निर्यातक बनने और ‘मेक इन इंडिया’ को नई ऊंचाई देने की बात करता है, तब बजट में उस विजन के अनुरूप रफ्तार नज़र नहीं आती। यहीं पर नीति और संसाधन के बीच का विरोधाभास चिंता पैदा करता है।
हालाँकि बजट का एक सकारात्मक और दूरदर्शी पक्ष भी है- हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर की घोषणा। मुंबई-पुणे से लेकर वाराणसी-सिलीगुड़ी तक प्रस्तावित ये कॉरिडोर केवल परिवहन परियोजनाएं नहीं, बल्कि भविष्य के आर्थिक गलियारे हैं। तेज़ कनेक्टिविटी से लॉजिस्टिक्स लागत घटेगी, उद्योग और पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और नए शहरी केंद्र विकसित होंगे। यदि ये परियोजनाएं समयबद्ध तरीके से पूरी होती हैं, तो यह बजट की सबसे बड़ी उपलब्धि साबित हो सकती हैं।
मध्यम वर्ग के लिए यह बजट अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता। यही वर्ग सबसे अधिक कर देता है- आयकर, जीएसटी, ईंधन कर- लेकिन आयकर स्लैब में कोई राहत नहीं दी गई। बढ़ती महंगाई, महंगी EMI और अस्थिर रोजगार के बीच यह वर्ग न तो योजनाओं का लाभार्थी बन पाता है और न ही नीतिगत राहत का। यह चुपचाप दबाव झेलने वाला वर्ग बनता जा रहा है।
शेयर बाजार और खुदरा निवेशकों के लिए सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) में बढ़ोतरी ने सक्रिय ट्रेडिंग को और महंगा बना दिया है। यदि उद्देश्य निवेशकों की सुरक्षा है, तो वित्तीय साक्षरता और बेहतर नियमन पर जोर होना चाहिए। केवल टैक्स बढ़ाना सबसे आसान रास्ता है, लेकिन इससे बाजार सहभागिता हतोत्साहित होती है।
सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB) से जुड़ी टैक्स अनिश्चितता भी निवेशकों के भरोसे को प्रभावित करती है। जब योजना शुरू हुई थी, तब मैच्योरिटी पर टैक्स-फ्री रिडेम्प्शन का स्पष्ट संदेश था। नियमों की बदलती व्याख्या निवेश के सबसे महत्वपूर्ण तत्व — विश्वास — को कमजोर करती है।
शिक्षा बजट में लगभग 8 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, लेकिन महंगाई समायोजन के बाद यह वृद्धि बहुत सीमित है। AI, डिजिटल शिक्षा और स्किल डेवलपमेंट की बातें सही दिशा में हैं, लेकिन यह बजट परिवर्तन से ज्यादा रखरखाव का प्रतीक लगता है। शिक्षा में वास्तविक क्रांति के लिए बड़े और संरचनात्मक निवेश की जरूरत है।
सरकार हर 100 रुपये खर्च करने पर लगभग 24 रुपये उधार ले रही है। खर्च का बड़ा हिस्सा पुराने कर्ज के ब्याज में चला जाता है। यह वित्तीय अनुशासन तो दर्शाता है, लेकिन विकास की रफ्तार को सीमित भी करता है।
सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य बीमा, आय-प्रतिस्थापन योजना, स्थायी विकलांगता कवर जैसे मुद्दे अब भी नीति के हाशिये पर हैं। प्रशासनिक सुधार, पुलिस और जेलों का आधुनिकीकरण, सरकारी भर्तियों में एकीकृत प्रणाली जैसे विषयों पर भी बजट मौन है।
कुल मिलाकर बजट 2026-27 अनुशासन और संतुलन का दस्तावेज़ है, लेकिन सवाल यही है कि क्या यह समय केवल जोखिम से बचने का था, या फिर भविष्य को निर्णायक रूप से आकार देने का? देश आज स्थिरता से आगे बढ़कर नेतृत्व की भूमिका चाहता है और उसके लिए बजट में साहसिक सुधारों की झलक और स्पष्ट होनी चाहिए थी।


















