बीएचयू में गूंजा गिरमिटिया इतिहास का गौरव, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में जुटे देश-विदेश के विद्वान
वाराणसी : सूरीनाम में भारतीय आगमन दिवस के उपलक्ष्य में काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के.एन. उड़प्पा सभागार में बृहस्पतिवार को दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ हुआ। कार्यक्रम का आयोजन पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग, कला संकाय बीएचयू, ग्लोबल गिरमिटिया काउंसिल एवं भारत सेवा ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। यह सम्मेलन 4 एवं 5 जून 2026 तक आयोजित किया जा रहा है।
शिक्षा, संस्कृति और स्वतंत्रता आंदोलन में हिंदी की भूमिका पर चर्चा
सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य गिरमिटिया देशों में हिंदी पत्रकारिता, साहित्य, शिक्षा, स्वतंत्रता आंदोलन तथा भारतीय संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन में प्रवासी भारतीयों के योगदान पर व्यापक चर्चा करना है। कार्यक्रम में देश-विदेश से आए विद्वानों, शिक्षाविदों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने सहभागिता कर अपने विचार व्यक्त किए।
प्रवासी भारतीयों के योगदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की पहल
मुख्य वक्ताओं ने कहा कि गिरमिटिया देशों में भारतीय मूल के लोगों ने विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखा। हिंदी पत्रकारिता और साहित्य ने वहां भारतीय पहचान को सशक्त बनाने के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता और सांस्कृतिक एकता को भी मजबूती प्रदान की है।
गिरमिटिया इतिहास संघर्ष और गौरव की गाथा : अरविंद पाण्डेय
इस अवसर पर ग्लोबल गिरमिटिया काउंसिल, वाराणसी के अध्यक्ष अरविंद पाण्डेय ने कहा कि गिरमिटिया इतिहास केवल प्रवास की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष, आत्मसम्मान और सांस्कृतिक संरक्षण का जीवंत दस्तावेज है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजनों से नई पीढ़ी को अपने गौरवशाली इतिहास और प्रवासी भारतीयों के योगदान को समझने का अवसर मिलता है।
प्रवासी भारतीयों की भूमिका प्रेरणादायी : बृजेश पाण्डेय
वहीं भारत सेवा ट्रस्ट के सचिव बृजेश पाण्डेय ने कहा कि भारतीय संस्कृति और हिंदी भाषा को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने में प्रवासी भारतीयों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने कहा कि भारत और गिरमिटिया देशों के बीच सांस्कृतिक एवं शैक्षिक संबंधों को और अधिक सशक्त बनाने की आवश्यकता है, जिससे साझा विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया जा सके।
के.एन. उड़प्पा सभागार में जुटे प्रोफेसर, शोधार्थी और छात्र
सम्मेलन के दौरान विभिन्न देशों से आए प्रोफेसरों एवं विशेषज्ञों ने हिंदी भाषा, पत्रकारिता, साहित्य, संस्कृति तथा भारतीय मूल के लोगों के सामाजिक योगदान पर अपने शोधपत्र और विचार प्रस्तुत किए। वक्ताओं ने प्रवासी भारतीय समुदाय द्वारा शिक्षा, सामाजिक विकास और सांस्कृतिक संरक्षण के क्षेत्र में किए गए कार्यों की सराहना की।
ये रहे मौजूद
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में प्रोफेसर, शोधार्थी, छात्र-छात्राएं एवं गणमान्य लोग उपस्थित रहे। सम्मेलन के पहले दिन विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श और अकादमिक सत्र आयोजित किए गए, जबकि दूसरे दिन भी कई महत्वपूर्ण सत्रों के माध्यम से प्रवासी भारतीयों के योगदान पर चर्चा जारी रहेगी।














