निर्जला एकादशी पर श्रद्धा और आस्था का सैलाब, बलुआ गंगा तट पर हजारों श्रद्धालुओं ने लगाई आस्था की डुबकी
चंदौली : ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी, जिसे निर्जला एकादशी कहा जाता है, पर शुक्रवार को बलुआ स्थित पश्चिम वाहिनीं गंगा तट पर श्रद्धा और आस्था का अनुपम संगम देखने को मिला। भोर की पहली किरण के साथ ही श्रद्धालुओं ने गंगा में डुबकी लगानी शुरू कर दी और दिन चढ़ते-चढ़ते हजारों लोगों ने पुण्य की कामना के साथ गंगा स्नान, पूजन और दान का महापर्व श्रद्धा के साथ मनाया।
गर्मी की तपिश में तपस्वियों ने निभाया कठिन व्रत
भीषण गर्मी और तपते सूरज के बावजूद श्रद्धालुओं की आस्था डिगी नहीं। निर्जला एकादशी का व्रत वर्ष भर की सभी एकादशियों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, और इसे कठिन तपस्या के रूप में पूजा जाता है। सनातन परंपरा के अनुसार इस दिन किया गया व्रत, गंगा स्नान और दान-पुण्य अक्षय फल प्रदान करता है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
इस अवसर पर गंगा तट पर स्नान और पूजन के लिए भक्तों की लंबी कतारें लगी रहीं। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन हुआ। पूरे दिन भर श्रद्धालु गंगा में स्नान करते रहे और मंदिरों में पूजा कर भगवान विष्णु का स्मरण करते रहे। जगह-जगह पर श्रद्धालुओं के लिए शीतल जल और छाया की व्यवस्था की गई थी।
सुरक्षा की दृष्टि से बलुआ थाने की पुलिस फोर्स तैनात रही। साथ ही गंगा सेवा समिति के दर्जनों कार्यकर्ता मौके पर मौजूद रहकर श्रद्धालुओं की मदद करते रहे। उन्होंने भीड़ को नियंत्रित करने, स्नान घाटों की व्यवस्था और चिकित्सा सहायता के लिए तत्परता दिखाई।
निर्जला एकादशी, आस्था और तप का संगम
यह एकादशी विशेष रूप से ‘भीमसेन एकादशी’ या ‘पांडव एकादशी’ के नाम से भी जानी जाती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, पांचों पांडवों में केवल भीमसेन इस कठिन उपवास को करने में सक्षम थे, क्योंकि उन्हें अन्य एकादशियों पर उपवास करने में कठिनाई होती थी। ऐसे में महर्षि व्यास ने उन्हें निर्जला एकादशी का व्रत करने का सुझाव दिया, जिसमें एक ही दिन में सभी एकादशियों का पुण्य प्राप्त होता है। तभी से यह व्रत विशेष महत्व रखता है।
बाजारों में रही रौनक, जगह-जगह दिखी सेवा भावना
गंगा घाट के आसपास के बाजारों में भी दिनभर रौनक रही। पूजा-पाठ से संबंधित सामग्री, फूल, प्रसाद आदि की दुकानों पर खूब भीड़ रही। वहीं सामाजिक संगठनों और स्थानीय लोगों द्वारा जगह-जगह ठंडे जल और शरबत वितरण की व्यवस्था की गई थी। बलुआ के व्यापारियों ने भी अपनी ओर से कई स्थानों पर सेवाभाव दिखाया।
पवित्र स्नान व पूजन से झलकी सनातन परंपरा
निर्जला एकादशी के इस पावन अवसर पर चंदौली के बलुआ घाट पर श्रद्धा, भक्ति, सेवा और अनुशासन का अद्भुत दृश्य देखने को मिला। यह आयोजन जहां सनातन संस्कृति और परंपरा की गरिमा को दर्शाता है, वहीं समाज के सहयोग और सेवा भावना का भी उदाहरण प्रस्तुत करता है। आस्था की इस गंगा में डुबकी लगाने वाले श्रद्धालुओं को न केवल पुण्य की प्राप्ति हुई, बल्कि सनातन जीवन मूल्यों की अनुभूति भी मिली।
“निर्जला एकादशी का यह महापर्व, केवल उपवास नहीं बल्कि आत्मशुद्धि, आस्था और सेवा का उत्सव बन गया।”


















