भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण का संदेश, एनएसएस के जागरूकता कार्यक्रम में छात्रों को किया गया प्रेरित
चंदौली : सावित्री बाई फुले राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, चकिया में मंगलवार को राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) इकाई के तत्वावधान में “भारतीय संस्कृति में पर्यावरण का महत्व” विषय पर जागरूकता कार्यक्रम एवं व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम महाविद्यालय की प्राचार्य की अध्यक्षता तथा राष्ट्रीय सेवा योजना प्रभारी डॉ. सुरेन्द्र कुमार सिंह के कुशल निर्देशन में संपन्न हुआ।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता अर्थशास्त्र विभाग के वरिष्ठ सहायक प्रोफेसर डॉ. शमशेर बहादुर ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय संस्कृति में पर्यावरण को जीवन का आधार और सृष्टि का अभिन्न अंग माना गया है। उन्होंने बताया कि वेदों, उपनिषदों, रामायण, महाभारत तथा पुराणों में पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश जैसे प्राकृतिक तत्वों को देवतुल्य मानकर उनकी पूजा एवं संरक्षण का संदेश दिया गया है।
उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में नदियों को माता, वृक्षों को जीवनदाता और पर्वतों को देवस्वरूप माना जाता है। गंगा, यमुना और नर्मदा जैसी नदियां केवल जल का स्रोत नहीं बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आस्था का केंद्र भी हैं। वहीं पीपल, वट, तुलसी और नीम जैसे वृक्षों की पूजा की परंपरा पर्यावरण संरक्षण के प्रति समाज की संवेदनशीलता को दर्शाती है।
राष्ट्रीय सेवा योजना प्रभारी डॉ. सुरेन्द्र कुमार सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा कि भारतीय दर्शन का मूल सिद्धांत “वसुधैव कुटुम्बकम्” संपूर्ण पृथ्वी को एक परिवार मानता है। यह विचार मानव, पशु-पक्षी, वनस्पति और समस्त जीव-जगत के प्रति सह-अस्तित्व एवं संवेदनशीलता की भावना को विकसित करता है। उन्होंने कहा कि “सर्वे भवन्तु सुखिनः” का आदर्श सभी प्राणियों के कल्याण का संदेश देता है और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में प्रेरित करता है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के कारण पर्यावरणीय संकट लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे में भारतीय संस्कृति के पर्यावरणीय मूल्य हमें प्रकृति के साथ संतुलित एवं सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने की सीख देते हैं। उन्होंने छात्रों से पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक और जिम्मेदार बनने का आह्वान किया।
कार्यक्रम में यह भी कहा गया कि वर्तमान सदी में छात्र-छात्राओं की चिंतन शक्ति को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील, तार्किक और सजग बनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। जागरूक युवा ही भविष्य में पर्यावरण संरक्षण की मजबूत नींव रख सकते हैं।
इस अवसर पर महाविद्यालय के डॉ. रमाकांत गौड़, विश्व प्रकाश शुक्ल, देवेंद्र बहादुर सिंह, डॉ. श्याम जन्म सोनकर, शैलेन्द्र सहित बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। कार्यक्रम के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को आत्मसात करने का संदेश दिया गया।


















