क्या सरकार हर भारतीय को 15-15 लाख रुपये देकर अमीर बना सकती है? जानिए अर्थशास्त्र का पूरा सच

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क्या सरकार हर भारतीय को 15-15 लाख रुपये देकर अमीर बना सकती है? जानिए अर्थशास्त्र का पूरा सच

यूपी TIMES18 : देश में जब भी महंगाई बढ़ती है, बेरोजगारी पर बहस तेज होती है या चुनावी माहौल बनता है, तब एक सवाल बार-बार लोगों के बीच चर्चा का विषय बन जाता है— “अगर सरकार चाहे तो हर भारतीय के खाते में 15-15 लाख रुपये क्यों नहीं डाल देती?” कुछ लोग इसे राजनीतिक बयान मानते हैं, कुछ मजाक में कहते हैं, जबकि कई लोग सचमुच यह सोचते हैं कि सरकार के पास इतना धन होता है कि वह एक ही फैसले में पूरे देश की गरीबी खत्म कर सकती है। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा संभव है? क्या केवल पैसा बांट देने से कोई देश अमीर बन सकता है?

डैडीज इंटरनेशनल स्कूल के संस्थापक एवं एल.टी.पी. कैलकुलेटर के आविष्कारक डॉ. विनय प्रकाश तिवारी बताते हैं कि यह सवाल जितना आसान दिखता है, उसका उत्तर उतना ही गहरा है। भारत की आबादी वर्तमान में लगभग 140 करोड़ है। यदि हर व्यक्ति को 15 लाख रुपये दिए जाएं, तो सरकार को कुल 2100 लाख करोड़ रुपये की जरूरत पड़ेगी। यह राशि इतनी विशाल है कि भारत सरकार का पूरा वार्षिक बजट भी इसके आसपास नहीं पहुंचता।

सरकार टैक्स, जीएसटी, पेट्रोल-डीजल, कंपनियों से मिलने वाले राजस्व और कर्ज के माध्यम से अपना खर्च चलाती है। इसी धन से सड़कें बनती हैं, सेना संचालित होती है, स्कूल-अस्पताल चलते हैं, किसानों को सहायता मिलती है और सरकारी योजनाएं लागू होती हैं। अब कल्पना कीजिए कि सरकार अचानक इतना पैसा छापकर लोगों के खातों में डाल दे। पहली नजर में यह सुनने में अच्छा लग सकता है, लेकिन इसका सबसे बड़ा असर बाजार पर पड़ेगा। जब हर व्यक्ति के पास लाखों रुपये होंगे, तो वह ज्यादा खरीदारी करेगा। कार, मकान, मोबाइल, सोना, दूध, सब्जी—हर चीज की मांग तेजी से बढ़ेगी।

लेकिन उत्पादन इतनी तेजी से नहीं बढ़ सकता। यानी सामान सीमित होगा और खरीददार अधिक। ऐसे में वस्तुओं के दाम आसमान छूने लगेंगे। अर्थशास्त्र की भाषा में इसे मुद्रास्फीति (Inflation) कहा जाता है। आज जो दूध 60 रुपये लीटर है, वह 500 रुपये तक पहुंच सकता है। सब्जियां, दवाइयां, किराया और रोजमर्रा की वस्तुएं महंगी हो जाएंगी। यानी लोगों के खाते में पैसा तो होगा, लेकिन उसकी असली कीमत खत्म हो जाएगी।

दुनिया में इसके उदाहरण पहले भी सामने आ चुके हैं।
जिम्बाब्वे में सरकार ने जरूरत से ज्यादा मुद्रा छापी, जिसके बाद हालात इतने खराब हुए कि लोगों को रोटी खरीदने के लिए नोटों के बोरे लेकर जाना पड़ा। वेनेजुएला में भी अत्यधिक मुद्रा छापने से अर्थव्यवस्था चरमरा गई और लाखों की तनख्वाह पाने वाले लोग भी एक समय का भोजन जुटाने के लिए संघर्ष करने लगे।

विशेषज्ञ बताते हैं कि कोई भी देश मुफ्त पैसा बांटकर अमीर नहीं बनता। देश तब समृद्ध होता है जब वहां उद्योग बढ़ते हैं, रोजगार पैदा होते हैं, शिक्षा मजबूत होती है और लोग कौशल सीखते हैं। इसी सोच के तहत सरकारें सीधे पैसा बांटने की बजाय सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया और किसान योजनाओं पर निवेश करती हैं ताकि लोग आत्मनिर्भर बन सकें।

एक और महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि हर व्यक्ति के खाते में 15 लाख रुपये आ जाएं, तो काम कौन करेगा? संभव है कुछ लोग नौकरी छोड़ दें, मेहनत कम कर दें और छोटे उद्योगों में कर्मचारियों की कमी हो जाए। इससे देश की उत्पादकता प्रभावित होगी।

डॉ. विनय प्रकाश तिवारी का कहना है कि किसी भी अर्थव्यवस्था की असली ताकत उसके लोग होते हैं उनकी मेहनत, उनका कौशल और उनकी उत्पादन क्षमता। हाँ, सरकार गरीबों की मदद जरूर करती है और करती रहेगी। किसान सम्मान निधि, उज्ज्वला योजना, मुफ्त राशन, छात्रवृत्ति और पेंशन जैसी योजनाएं इसका उदाहरण हैं, लेकिन ये योजनाएं नियंत्रित और सीमित होती हैं ताकि अर्थव्यवस्था संतुलित बनी रहे।

उन्होंने कहा कि आज सोशल मीडिया के दौर में आधी-अधूरी आर्थिक बातें तेजी से फैलती हैं। लोग मान लेते हैं कि सरकार के पास असीमित पैसा है, जबकि सच्चाई यह है कि सरकार भी आय और कर्ज के संतुलन पर चलती है। उनके अनुसार भारत जैसे युवा देश के लिए सबसे बड़ा “15 लाख” कोई मुफ्त राशि नहीं, बल्कि अच्छी शिक्षा, सही कौशल, रोजगार के अवसर और वित्तीय समझ है। जिस दिन देश का युवा निवेश, बचत और उद्यमिता को समझ जाएगा, वह खुद अपनी मेहनत से 15 लाख क्या, उससे कहीं अधिक कमाने की क्षमता विकसित कर लेगा।

यही किसी भी मजबूत राष्ट्र की पहचान होती है जहां लोग सरकार के पैसों से नहीं, अपनी क्षमता से आगे बढ़ते हैं।