चंदौली हत्याकांड के बाद चर्चा में “साइको किलर”, जानिए क्या कहता है मनोविज्ञान
चंदौली : जिले में हाल के दिनों में हुई सनसनीखेज हत्याओं की घटनाओं ने पूरे जिले को दहशत में डाल दिया है। सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक एक ही शब्द चर्चा का केंद्र बना हुआ है “साइको किलर”। आखिर यह “साइको किलर” होता क्या है? क्या वह जन्म से अपराधी होता है, मानसिक रूप से बीमार होता है, या फिर समाज और परिस्थितियां उसे इस अंधेरे रास्ते पर धकेल देती हैं? इन सवालों ने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
डॉ विनय प्रकाश तिवारी ने आसान भाषा मे समझाया
इसी गंभीर विषय पर एल.टी.पी. कैलकुलेटर (LTP Calculator) के आविष्कारक एवं सामाजिक चिंतक डॉ. विनय प्रकाश तिवारी ने अपनी स्पष्ट और वैज्ञानिक राय रखते हुए कहा कि “साइको किलर” कोई मेडिकल या आधिकारिक मनोवैज्ञानिक शब्द नहीं है, बल्कि यह आम बोलचाल का शब्द है, जिसका उपयोग ऐसे व्यक्तियों के लिए किया जाता है जो बिना सामान्य मानवीय संवेदनाओं के हिंसक अपराध करते हैं और कई बार उन्हें अपने किए का कोई पछतावा भी नहीं होता।
बेहद शांत होकर वारदात को दिया अंजाम
डॉ. तिवारी के अनुसार, चंदौली की हालिया घटना ने लोगों को इसलिए अधिक विचलित किया क्योंकि आरोपी के व्यवहार में डर, घबराहट या अपराधबोध जैसी सामान्य मानवीय प्रतिक्रियाएं दिखाई नहीं दीं। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, आरोपी ने बेहद शांत और नियंत्रित तरीके से वारदात को अंजाम दिया, जो लोगों के मन में “साइको किलर” जैसी आशंका को जन्म देता है।
मनोविज्ञान की नज़र में क्यों खतरनाक होते है ऐसे लोग
उन्होंने बताया कि मनोविज्ञान की भाषा में ऐसे व्यक्तियों को कई बार Psychopath या Sociopath जैसी श्रेणियों में समझा जाता है। ऐसे लोगों में अक्सर दूसरों के दर्द के प्रति संवेदनाएं कम हो जाती हैं, अपराधबोध समाप्त होने लगता है और वे इंसानों को व्यक्ति नहीं, बल्कि “लक्ष्य” की तरह देखने लगते हैं।
सामान्य दिखने वाले लोग भी हो सकते खतरनाक
डॉ. तिवारी ने कहा कि समाज की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह ऐसे लोगों की पहचान फिल्मों के आधार पर करता है। फिल्मों में “साइको किलर” को अक्सर डरावने चेहरे, अजीब हंसी और असामान्य हरकतों वाले व्यक्ति के रूप में दिखाया जाता है, जबकि वास्तविक जीवन में ऐसे लोग अक्सर सामान्य, शिक्षित, शांत और सामाजिक रूप से सक्रिय दिखाई देते हैं। यही बात उन्हें अधिक खतरनाक बनाती है, क्योंकि उनके भीतर का मानसिक संघर्ष बाहर से दिखाई नहीं देता।
तनाव और सामाजिक अलगाव से टूट रहे लोग
उन्होंने यह भी कहा कि आज के दौर में तनाव, अकेलापन, नशा, असफलता, सामाजिक अलगाव और लगातार मानसिक दबाव कई लोगों को भीतर से तोड़ रहा है। हर टूटा हुआ व्यक्ति अपराधी नहीं बनता, लेकिन जब मानसिक पीड़ा का इलाज नहीं होता, तो कुछ लोग हिंसा की ओर बढ़ सकते हैं।
संवाद और संवेदना ही रोक सकते है ऐसी घटनाएं
डॉ. तिवारी ने जोर देकर कहा कि चंदौली जैसी घटनाएं सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं हैं, बल्कि समाज के लिए एक चेतावनी हैं। यह समय है जब हमें मानसिक स्वास्थ्य को गंभीरता से लेना होगा, परिवार और समाज में संवाद बढ़ाना होगा और लोगों की भावनात्मक समस्याओं को समय रहते समझना होगा।
समाज अगर मन नही समझेगा, तो अपराध सिर्फ बढ़ते जाएंगे
उन्होंने अंत में कहा, “असली सवाल यह नहीं कि अपराध के बाद हम कितने डरते हैं, बल्कि यह है कि क्या हम समय रहते उस टूटे हुए दिमाग को पहचान पाते हैं, जो आगे चलकर समाज के लिए खतरा बन सकता है। कई बार सबसे बड़ा खतरा हथियार नहीं, बल्कि वह मन होता है जिसे समाज समझ नहीं पाता।”


















