अहंकार छीन लेता है खूबसूरत रिश्ते, क्रोध, मान, माया और लोभ-जीवन की इन चार विसंगतियों का जनक अहंकार

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अहंकार छीन लेता है खूबसूरत रिश्ते, क्रोध, मान, माया और लोभ-जीवन की इन चार विसंगतियों का जनक अहंकार

UP TIMES18 : अहंकार शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के ‘अहम’ अर्थात ‘मैं’ से हुई है. ‘मैं’ में केंद्रित होने वाला व्यक्ति अहंकार रूपी रोग से ग्रस्त होता है. जब बच्चा जन्म लेता है तो उसके भीतर इस रोग के कोई अणु नहीं होते लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता है, वैसे-वैसे बच्चे में प्रतिस्पर्धा का भाव प्रबल होता जाता है. कुछ अलग करने की, दूसरों से बड़ा होने-दिखने की सोच मस्तिष्क पर हावी होती जाती है. इसी से हमारे भीतर अहंकार का बीज पनपने लगता है.

शुरू में तो यह भाव-आवेग हमारे वश में होता है, पर समय बीतने पर यह इतना बलशाली हो जाता है कि हम उसके सेवक बन जाते हैं. हमारे समूचे कार्यकलाप ही अहंकार-पूर्ति से प्रेरित होने लगते हैं. अहंकार वह पात्र बन जाता है जो कभी भरने का नाम नहीं लेता. धन, पद-प्रतिष्ठा और यश पाकर भी हम असंतुष्ट-अतृप्त रह जाते हैं. जीवन उस मरुस्थल के समान बन जाता है, जिसमें अहंकार-तृप्ति की प्यास मृगतृष्णा जैसी बन जाती है.

इंसान का अहंकारी होना जीवन की बड़ी विसंगति है. मानव चाहे साधारण हो या कोई बड़ा ऋषि-मुनि, कम या अधिक अहंकार सब में होता है. यह ऐसी मनोग्रंथि है जो व्यक्ति, परिवार, समाज एवं राष्ट्र को नष्ट कर देती है. हमने कुछ ऐसी अवधारणाएं एवं मान्यताएं बना ली हैं कि चाहकर भी इससे मुक्त नहीं हो पाते हैं. क्रोध, मान, माया और लोभ-जीवन की इन चार विसंगतियों का जनक अहंकार ही है..अहंकार से मुक्त होना कोई आसान काम नहीं है.

अहंकार के बलवती होने से जीवन जटिल और संघर्षपूर्ण बन जाता है. अहंकार के मद में हम और अधिक गहरे डूबते चले जाते हैं. असंतोष, ईर्ष्या, लोभ, क्रोध अहंकार रूपी रोग के ही लक्षण हैं. अहंकार के चक्रव्यूह को तोड़ पाना आसान नहीं है. उसके लिए सर्वप्रथम मन-प्राण से नम्रता, समर्पण और त्याग की सीढ़ी पर पांव रखना आवश्यक है. चूंकि अहंकार का घर कपाल में छुपे मन-मस्तिष्क में है, शायद इसीलिए हमारे पूर्वजों ने अनेक ऐसे धार्मिक अनुष्ठानों की रचना की जिनमें हमें अपना सिर झुकाना पड़ता है. प्रतीकात्मक दृष्टि से देखें तो नारियल फोड़ना, केश मुंडवाना आदि सभी अहंकार को चूर करने की निशानी हैं.

अहंकार से छुटकारा पाने की अगली सीढ़ी है- मृत्यु-बोध. हम जिस सुंदर शरीर, सांसारिक उपलब्धि और पद-प्रतिष्ठा पर गुमान करते हैं, वे सभी क्षणभंगुर हैं, फिर भी हम उन्हें पाने के लिए गलत काम करने से नहीं चूकते. पर जब हमारे भीतर यह अंतर्ज्ञान जाग जाता है कि मृत्यु ही जीवन यात्रा का अंतिम पड़ाव है तो अहंकार का भाव समर्पण में होम हो जाता है. इसके अलावा हृदय में प्रेम का दीया जलता रहे तो अहंकार के रोग से मुक्ति पाना आसान होता है. प्रेम की लौ से अहंकार का अंधेरा अपने आप ही छंट जाता है. यदि इस दीपमाला में प्रेम के साथ-साथ समर्पण का दीया भी जल उठे तो अहंकार रोग पास नहीं फटक पाता. मानवता का दिव्य प्रकाश चारों दिशा में अपनी रोशनी फैलाने लगता है.

हम अपने भीतर छुपे अहंकार के अंधेरे को जीत लें तो यह संसार अपने आप स्वर्ग सरीखा हो उठेगा. उसमें न कोई छोटा होगा, न कोई बड़ा. न कोई निर्धन होगा, न कोई धनी, न कोई राजा होगा, न कोई रंक! सभी अपनी-अपनी कर्मयात्रा में लीन रहकर ही जीवन का सच्चा सुख भोग सकेंगे.