धान की फसल को रोग-कीटों से बचाने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र ने जारी की एडवाइजरी, अधिक नमी, लगातार बारिश और असंतुलित यूरिया के प्रयोग से बढ़ सकता है प्रकोप
चंदौली : वर्तमान मौसम में अधिक आर्द्रता, लगातार बारिश, खेतों में नमी और नत्रजन उर्वरक के असंतुलित प्रयोग के कारण धान की फसल में विभिन्न रोगों एवं कीटों का प्रकोप बढ़ने की आशंका है। किसानों की समस्याओं को देखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र, चंदौली ने रोग एवं कीटों की पहचान तथा उनके प्रभावी प्रबंधन को लेकर एडवाइजरी जारी की है।
कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. नरेंद्र रघुवंशी ने किसानों से धान की फसल का नियमित निरीक्षण करने और रोग के शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखाई देते ही उचित नियंत्रण उपाय अपनाएं। किसानों को स्वस्थ एवं प्रमाणित बीज का प्रयोग करने, रोगग्रस्त खेत से बीज नहीं लेने तथा विशेषज्ञ की सलाह के बिना विभिन्न रसायनों को आपस में मिलाकर प्रयोग करने से बचने की सलाह दी गई है।
शीथ ब्लाइट से बचाव जरूरी
कृषि विज्ञान केंद्र के अनुसार वर्तमान परिस्थितियों में धान में शीथ ब्लाइट रोग का प्रकोप बढ़ सकता है। यह रोग राइजोक्टोनिया सोलानी नामक फफूंद के कारण होता है। रोग की शुरुआत सामान्यतः पानी की सतह के पास पौधे की निचली पत्ती की म्यान पर अंडाकार हरे-भूरे अथवा कत्थई धब्बों से होती है। अनुकूल परिस्थितियों में ये धब्बे तेजी से ऊपर की ओर फैलते हैं, जिससे पत्ती और पत्ती की म्यान सूखने लगती है तथा दाना भरने पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
डॉ. रघुवंशी ने बताया कि खेत में अनावश्यक जलभराव न होने दें, यूरिया का संतुलित मात्रा में प्रयोग करें तथा खेत एवं मेड़ों को खरपतवार मुक्त रखें। रोग के लक्षण दिखाई देने पर विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार अनुशंसित फफूंदनाशकों का प्रयोग किया जा सकता है।
जीवाणु झुलसा से बचाव की सलाह
कृषि विज्ञान केंद्र के विषय वस्तु विशेषज्ञ (अनुवांशिकी एवं पादप प्रजनन विज्ञान) डॉ. अभयदीप गौतम ने बताया कि अधिक नमी, लगातार वर्षा, तेज हवा और खेत में लंबे समय तक पानी भरे रहने से धान में जीवाणु झुलसा रोग का प्रकोप बढ़ सकता है।
उन्होंने बताया कि प्रारंभिक अवस्था में पत्तियां धूसर-हरे रंग की होकर मुड़ने लगती हैं। बाद में पत्तियों के किनारों से पीले अथवा भूसे के रंग के धब्बे दिखाई देते हैं, जो धीरे-धीरे पूरी पत्ती को सुखा सकते हैं। अधिक प्रकोप की स्थिति में पौधों की बढ़वार, बालियों के विकास, दानों की गुणवत्ता और उपज पर प्रतिकूल असर पड़ता है।
उन्होंने किसानों को खेत में लगातार पानी जमा नहीं होने देने और अतिरिक्त पानी की निकासी की व्यवस्था करने की सलाह दी। साथ ही नत्रजन उर्वरक का अत्यधिक प्रयोग न करने तथा संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन अपनाने को कहा। रोग के लक्षण दिखाई देने पर कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार कॉपर ऑक्सीक्लोराइड एवं स्ट्रेप्टोसाइक्लिन के अनुशंसित मिश्रण का छिड़काव करने की सलाह दी गई है।
तना छेदक कीट पर रखें नजर
कृषि विज्ञान केंद्र के विषय वस्तु विशेषज्ञ (सस्य विज्ञान) श्री रितेश सिंह गंगवार ने बताया कि धान में तना छेदक कीट की समय पर पहचान और नियंत्रण बेहद जरूरी है। इसकी सुंडी पौधे के तने के अंदर प्रवेश कर मुख्य तने को नुकसान पहुंचाती है, जिससे उत्पादन में भारी कमी हो सकती है।
उन्होंने बताया कि प्रारंभिक अवस्था में पौधे की बीच वाली कोंपल पीली होकर सूख जाती है, जिसे डेड हार्ट कहा जाता है। बालियां निकलने की अवस्था में प्रभावित बालियां सफेद होकर दाना रहित रह जाती हैं, जिसे व्हाइट ईयर कहा जाता है। तने पर छोटे छेद तथा आसपास कीट का मल या बुरादा दिखाई देना भी इसके प्रकोप का संकेत है।
तना छेदक के नियंत्रण के लिए अनुशंसित कीटनाशकों का निर्धारित मात्रा में प्रयोग करने की सलाह दी गई है। साथ ही दानेदार कीटनाशकों को सूखी रेत या बालू में मिलाकर खेत में समान रूप से बिखेरने की बात कही गई है। कीटनाशक का प्रयोग फसल की अवस्था एवं प्रकोप के अनुसार कृषि विशेषज्ञ की सलाह से करने पर जोर दिया गया है।
कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने किसानों से अपील की है कि फसल की नियमित निगरानी करें और रोग अथवा कीट का प्रारंभिक लक्षण दिखाई देते ही नियंत्रण उपाय अपनाएं। एक साथ अनावश्यक रूप से कई कीटनाशकों या रसायनों का मिश्रण न करें तथा दवाओं के लेबल पर दिए निर्देशों और सुरक्षा सावधानियों का अनिवार्य रूप से पालन करें।
अधिक जानकारी एवं कृषि संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए किसान कृषि विज्ञान केंद्र, बिछिया कला, चंदौली (आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या) से संपर्क कर सकते हैं।


















