दीवाली पर प्रदूषण की चिंता, लेकिन क्रिसमस और न्यू ईयर पर चुप्पी क्यों? डॉ. विनय प्रकाश तिवारी ने उठाया दोहरे रवैये पर सवाल

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दीवाली पर प्रदूषण की चिंता, लेकिन क्रिसमस और न्यू ईयर पर चुप्पी क्यों? डॉ. विनय प्रकाश तिवारी ने उठाया दोहरे रवैये पर सवाल

चंदौली : डैडीज इंटरनेशनल स्कूल के संस्थापक एवं एल.टी.पी. कैलकुलेटर के आविष्कारक डॉ. विनय प्रकाश तिवारी ने दीवाली के मौके पर समाज में व्याप्त दोहरे मानदंडों पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि “जैसे ही दीवाली आती है, सोशल मीडिया और कुछ तथाकथित पर्यावरण प्रेमी अचानक सक्रिय हो जाते हैं। ‘AQI बढ़ गया’, ‘जानवर डर गए’, ‘लोगों को सांस नहीं आ रही’ जैसे नारों से वातावरण भर जाता है। लेकिन यही आवाज़ें क्रिसमस और न्यू ईयर की रात को कहां चली जाती हैं, जब दुनिया भर में आसमान पटाखों की रोशनी से भर जाता है?” डॉ. तिवारी ने कहा “क्या तब प्रदूषण नहीं होता? या फिर त्योहार देखकर पर्यावरण भी धर्म बदल लेता है?”

क्या दीवाली पर प्रदूषण सचमुच बढ़ता है?

उन्होंने माना कि दीवाली के समय प्रदूषण का स्तर बढ़ता है। खासतौर पर अक्टूबर-नवंबर में, जब ठंडी हवा और पराली जलने से पहले ही वातावरण भारी हो जाता है। लेकिन उनके अनुसार, “सवाल यह नहीं कि दीवाली प्रदूषण बढ़ाती है या नहीं, सवाल यह है कि क्या सिर्फ दीवाली ही दोषी है?”

क्रिसमस और न्यू ईयर पर पटाखे – तब कोई क्यों नहीं बोलता?

डॉ. तिवारी ने उदाहरण देते हुए कहा कि “लंदन, दुबई, सिडनी, न्यूयॉर्क जैसे शहरों में न्यू ईयर पर लाखों डॉलर के फायरवर्क्स होते हैं, लेकिन तब कोई नहीं कहता कि ‘सेहत खतरे में है’ या ‘यह कल्चर गलत है’। तब वही पटाखे सेलिब्रेशन कहलाते हैं।”

उन्होंने कहा कि यही हमारी सबसे बड़ी समस्या है – पटाखों से ज्यादा सोच की। “जब दीवाली पर पटाखे फूटते हैं तो वह ‘प्रदूषण’ कहलाते हैं, और जब न्यू ईयर पर वही फूटते हैं तो ‘जश्न’। यही असली पाखंड है।”

वैज्ञानिक पहलू

डॉ. तिवारी ने यह भी स्पष्ट किया कि दीवाली का धुआं ज़्यादा दिखाई देता है क्योंकि उस समय हवा ठंडी होती है और स्मॉग ऊपर नहीं उठ पाता। पराली जलने का समय भी वही होता है, जिससे धुआं और धूल वातावरण में फंस जाते हैं। उन्होंने कहा “बात सही है, लेकिन पूरा दोष सिर्फ पटाखों पर डालना गलत है। असली समस्या असंतुलन और दोहरे रवैये की है।”

समाधान क्या हो सकता है?

डॉ. तिवारी ने कहा कि पटाखों पर बैन या किसी त्योहार को दोष देने के बजाय संतुलित समाधान की जरूरत है।

◆ ग्रीन पटाखों का प्रयोग बढ़ाया जाए

◆ समय सीमा तय हो (रात 8 से 10 बजे तक)

◆ अवैध चाइनीज़ पटाखों पर सख्त रोक

◆ बच्चों, युवाओं को जागरूक किया जाए, शर्मिंदा नहीं

◆ पराली, फैक्ट्री और गाड़ियों के धुएं पर भी समान गंभीरता से बात हो

अंतिम विचार

डॉ तिवारी ने कहा “त्योहार हमारी संस्कृति का प्रतीक हैं, लेकिन स्वच्छ हवा भी हमारा अधिकार है,” कहा कि “समस्या पटाखों से नहीं, पाखंड से है। जब एक त्योहार पर हम पर्यावरण की चिंता करते हैं, और दूसरे पर उसे भूल जाते हैं तब यह आस्था नहीं, राजनीति बन जाती है।” जरूरत है संतुलन की, न अंध-भक्ति, न अंध-विरोध।

निष्कर्ष

दीवाली पर प्रदूषण की चिंता वाजिब है, लेकिन अगर वही चिंता क्रिसमस, न्यू ईयर या अन्य मौकों पर गायब हो जाए, तो यह पर्यावरण प्रेम नहीं, बल्कि दोहरा रवैया है। पटाखों पर प्रतिबंध लगाने से ज्यादा जरूरी है संतुलन – ग्रीन पटाखों का उपयोग, समय-सीमा का पालन और बाकी प्रदूषण स्रोतों पर भी उतनी ही सख्ती। त्योहार हमारी परंपरा हैं, उन्हें दोष नहीं, दिशा चाहिए। असली समाधान तब मिलेगा जब हम प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई में निष्पक्ष और ईमानदार होंगे। न पटाखों से नफरत, न पाखंड से समझौता।