समाज की सच्चाई : स्वार्थ के रिश्तों में घिरती इंसानियत

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लेखक : पवन पाण्डेय ✍️

यूपी TIMES18 : दुनिया आज तेज़ी से आगे बढ़ रही है, लेकिन रिश्तों की संवेदनशीलता और आपसी सरोकार पीछे छूटते जा रहे हैं। आधुनिक समाज में स्वार्थ इस कदर हावी हो गया है कि जब तक आप दूसरों के काम आते हैं, तब तक आप बेहद अपने होते हैं। आपकी मौजूदगी ज़रूरी होती है, आपकी बातों की क़द्र होती है, और आपके फोन-मैसेज का तुरंत जवाब भी मिलता है।

ज़रूरत पड़ते ही अपने बने अजनबी

लेकिन जैसे ही आप अपनी किसी ज़रूरत के लिए आवाज़ उठाते हैं, हालात बदल जाते हैं। वही लोग, जो कल तक हर वक्त संपर्क में रहते थे, आज अनजान बन जाते हैं। कॉल करते रहिए, मैसेज भेजते रहिए- कोई जवाब नहीं, कोई प्रतिक्रिया नहीं। ऐसा महसूस होता है मानो सामने वाला आपको जानता ही नहीं।

फायदे पर टिका है आज का हर रिश्ता

यह व्यवहार केवल व्यक्तिगत रिश्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक और पेशेवर जीवन में भी गहराई से पैठ बना चुका है। लोग संबंधों को भावना से नहीं, बल्कि सुविधा और फायदे के तराजू में तौलने लगे हैं। जब तक लाभ है, संबंध है; और जैसे ही लाभ समाप्त, रिश्ते भी खत्म।

स्वार्थ की बढ़ती सोच पर समाज के जानकारों की राय

समाज के जानकारों का मानना है कि यह प्रवृत्ति भविष्य के लिए गंभीर संकेत है। यदि इंसान केवल अपने स्वार्थ तक सीमित रह गया, तो विश्वास, सहयोग और संवेदनशीलता जैसे मूल्य केवल किताबों और भाषणों तक सिमट कर रह जाएंगे।

संवेदना बची तो समाज बचेगा

आज जरूरत इस बात की है कि हम आत्ममंथन करें- रिश्तों को स्वार्थ नहीं, संवेदना से जोड़ें। क्योंकि जिस दिन इंसानियत पूरी तरह अनदेखी हो गई, उस दिन दुनिया भले ही आगे बढ़ जाए, लेकिन इंसान भीतर से बेहद अकेला रह जाएगा।

निष्कर्ष

स्वार्थ की बढ़ती प्रवृत्ति ने रिश्तों की आत्मा को कमजोर कर दिया है। आज संबंध आवश्यकता और लाभ पर टिके नज़र आते हैं, न कि भरोसे और भावनाओं पर। जब तक हम दूसरों के काम आते हैं, तब तक हमारी अहमियत होती है, और ज़रूरत पड़ते ही हमें अनदेखा कर दिया जाता है। ऐसे में समाज को आत्मचिंतन की आवश्यकता है- क्योंकि यदि इंसानियत और आपसी सहयोग नहीं बचेगा, तो प्रगति के बीच भी मानव समाज भीतर से खोखला होता चला जाएगा।

Disclaimer…

यह सामग्री समाज में प्रचलित व्यवहार और मानवीय अनुभवों पर आधारित है। इसमें व्यक्त विचार किसी व्यक्ति, संस्था या समुदाय विशेष को लक्षित करने के उद्देश्य से नहीं लिखे गए हैं। इसका उद्देश्य केवल सामाजिक प्रवृत्तियों पर प्रकाश डालना और आत्ममंथन के लिए प्रेरित करना है। किसी भी प्रकार की समानता संयोग मात्र है।